दमोह: जिले के बटियागढ़ ब्लॉक का एक सरकारी स्कूल इन दिनों शिक्षा के क्षेत्र में नई पहचान बना रहा है। यह स्कूल न सिर्फ बच्चों की पढ़ाई को रोचक बना रहा है, बल्कि अपनी शैक्षणिक गतिविधियों को सोशल मीडिया के माध्यम से आम लोगों तक पहुंचाकर सरकारी स्कूलों के प्रति बनी नकारात्मक सोच को भी तोड़ रहा है।
हम बात कर रहे हैं शासकीय प्राथमिक शाला ग्राम लिधौरा की, जहां बच्चों की पढ़ाई और एक्टिविटीज़ के वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आ रहे हैं। इन वीडियो को देखने वाला हर व्यक्ति यह कहने पर मजबूर हो जाता है कि “क्या वाकई यह सरकारी स्कूल है भक्ति, भाषा और आत्मविश्वास का अनोखा संगम
नवदुर्गा पर्व के दौरान बच्चों को भक्ति भाव के साथ गरबा सीखते हुए देखा गया। वहीं दूसरी ओर बच्चे अंग्रेज़ी में बातचीत, “तेज़ बोलो, सही बोलो” जैसी भाषा संबंधी एक्टिविटी, माइक पकड़कर मंच से बोलने का अभ्यास, पढ़ाई के साथ खेल-खेल में सीखना, और यहां तक कि अन्य भाषाओं का परिचय भी प्राप्त कर रहे हैं। शिक्षा की यह शैली सिर्फ किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों में आत्मविश्वास, अभिव्यक्ति और सामाजिक कौशल को भी विकसित कर रही है। कई शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की भाषा और पर्सनैलिटी डेवलपमेंट एक्टिविटीज़ बड़े-बड़े निजी स्कूलों में भी बहुत कम देखने को मिलती हैं। सोशल मीडिया से बदली सोच *इस स्कूल की शिक्षिका ने बताया कि* सोशल मीडिया अकाउंट बनाने का मुख्य उद्देश्य गांव वालों के मन से यह धारणा हटाना था कि “सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती”। साथ ही, इससे दूसरे शिक्षक भी एक-दूसरे से नए आइडिया ले सकते हैं और अभिभावक भी बच्चों की प्रगति पर सीधे नजर रख सकते हैं।
*जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के लिए उदाहरण*
शासकीय प्राथमिक शाला ग्राम लिधौरा आज न केवल बटियागढ़ ब्लॉक बल्कि पूरे दमोह जिले के लिए प्रेरणा का केंद्र बन चुकी है। जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग और अन्य सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को यहां की कार्यशैली से सीख लेकर इसे अन्य स्कूलों में भी लागू करना चाहिए।
सरकारी स्कूलों की बदली हुई यह तस्वीर बताती है कि यदि शिक्षक में नवाचार, समर्पण और सोच बदलने का जज़्बा हो, तो संसाधनों की कमी भी शिक्षा की गुणवत्ता में बाधा नहीं बनती।
सोशल मीडिया पर छाए सरकारी स्कूल के बच्चे, हर कोई बोले – क्या वाकई यह सरकारी स्कूल है?
