सरकारी योजनाएं या कर्मचारियों की जान पर जोखिम? दमोह की घटना ने खड़े किए गंभीर सवाल
दमोह में हाल ही में घटी एक घटना ने शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को उजागर कर दिया है। बिजली विभाग के कर्मचारी जब अवैध बिजली कनेक्शनों की जांच के लिए मौके पर पहुंचे, तो उन पर हमला कर दिया गया। मारपीट की गई, अभद्र भाषा का प्रयोग हुआ और स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि कर्मचारियों को बिना कार्रवाई पूरी किए ही वापस लौटना पड़ा। इसके बाद पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाई,
यह घटना केवल एक विभाग या एक जिले की समस्या नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता की ओर इशारा करती है, जहां सरकारी योजनाओं और रियायतों को अधिकार समझ लिया जाता है, कर्तव्य नहीं। सरकार द्वारा आम जनता को राहत देने के उद्देश्य से चलाई जा रही योजनाएं—चाहे वह बिजली बिल में छूट हो या अन्य सब्सिडी—तब बेमानी हो जाती हैं, जब उनका दुरुपयोग होने लगता है।
सवाल कई हैं…
क्या सरकारी कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी नहीं है?
क्या अवैध गतिविधियों पर कार्रवाई करना अपराध है?
क्या सरकारी योजनाओं का मतलब यह है कि नियम-कानून ताक पर रख दिए जाएं?
बिजली चोरी जैसी गतिविधियां न केवल राजस्व को नुकसान पहुंचाती हैं, बल्कि ईमानदारी से बिल भरने वाले उपभोक्ताओं के साथ भी अन्याय करती हैं। ऐसे में जब विभागीय कर्मचारी नियमों के तहत जांच करने पहुंचते हैं और उन पर हमला होता है, तो यह कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है।
कर्मचारियों का मनोबल भी है अहम
मैदान में काम करने वाले कर्मचारी सरकार की नीतियों को लागू करने की कड़ी होते हैं। यदि उनकी सुरक्षा ही सुनिश्चित न हो, तो योजनाओं का क्रियान्वयन कैसे होगा? लगातार हमले और विरोध की घटनाएं कर्मचारियों के मनोबल को तोड़ती हैं।
जरूरत सख्त संदेश की
ऐसी घटनाओं में त्वरित और कड़ी कार्रवाई जरूरी है, ताकि स्पष्ट संदेश जाए कि कानून हाथ में लेने वालों को बख्शा नहीं जाएगा। साथ ही, कर्मचारियों को सुरक्षा उपलब्ध कराना और संवेदनशील क्षेत्रों में पुलिस बल के साथ जांच कराना समय की मांग है।
सरकारी योजनाएं जनता के कल्याण के लिए बनती हैं, न कि कानून तोड़ने या कर्मचारियों को डराने-धमकाने के लिए। दमोह की घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि कहीं व्यवस्था की नरमी का गलत फायदा तो नहीं उठाया जा रहा?
अब देखना यह है कि प्रशासन इस घटना को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं।
